(आलेख : राजेंद्र शर्मा ) फोटो
देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस प्रक्रिया की शुरुआत के समय ही कई सामाजिक संगठनों, नागरिक अधिकार समूहों और विपक्षी दलों ने आशंका जताई थी कि इसे जिस तरीके से लागू किया जा रहा है, उससे बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। अब सामने आए आंकड़े इस बहस को और तेज कर रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2024 के आम चुनाव के बाद सामान्य अपडेट के तहत देश में करीब 60 करोड़ मतदाता सूची में दर्ज थे। इसके बाद “शुद्धिकरण” और पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान करीब 6 करोड़ यानी लगभग 10 फीसदी मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। यही आंकड़ा अब सबसे बड़े विवाद का कारण बन गया है।
आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ सूची अपडेट करने की प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के बाहर हो जाने की स्थिति बन गई है। उनका आरोप है कि दस्तावेजों की सख्त मांग, कम समय और जटिल प्रक्रिया के कारण खासकर गरीब, प्रवासी मजदूर, महिलाएं और कम शिक्षित लोग ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
पश्चिम बंगाल इस पूरे मामले का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां पुनरीक्षण के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम ‘संदिग्ध’ या ‘न्यायाधीन’ श्रेणी में डाल दिए गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोगों को अपने दस्तावेजों के साथ सत्यापन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, लेकिन समयसीमा और प्रक्रिया की जटिलता के कारण वे समय पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सके। नतीजतन, करीब 30 से 35 लाख मतदाता चुनाव के दौरान मतदान से वंचित रह गए।
बताया जाता है कि इस प्रक्रिया में एक सॉफ्टवेयर आधारित जांच प्रणाली का भी इस्तेमाल किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में नामों को “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” के आधार पर चिन्हित किया गया। बाद में इनमें से कई नाम सही पाए गए, लेकिन तब तक चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी।
इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मतदाता सूची अपडेट करने के नाम पर ऐसी शर्तें लागू की जा रही हैं, जो कहीं न कहीं नागरिकता की जांच जैसी स्थिति पैदा करती हैं और यह संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हो सकता है। हालांकि, अदालत ने अभी तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है, लेकिन प्रभावित लोगों को भविष्य में अपने नाम फिर से जुड़वाने का विकल्प खुला रखा है।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना उसकी जिम्मेदारी है। आयोग के मुताबिक, डुप्लीकेट, मृत या गलत प्रविष्टियों को हटाना जरूरी है ताकि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी बने रहें। आयोग यह भी कहता है कि पूरी प्रक्रिया नियमों और तय मानकों के तहत की गई है।
फिलहाल, यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार और चुनाव आयोग इसे जरूरी सुधार बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और नागरिक संगठनों का आरोप है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंता का संकेत है।
आने वाले चुनावों से पहले यह मुद्दा और ज्यादा अहम हो सकता है। मतदाता सूची का यह अपडेट अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।







