क्या बलूचिस्तान बन सकता है दुनिया का अगला नया देश? स्वतंत्रता की मांग के सामने अंतरराष्ट्रीय मान्यता की बड़ी चुनौती
नई दिल्ली। पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में लंबे समय से चल रहे स्वतंत्रता समर्थक आंदोलन ने एक बार फिर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींचा है। बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वाले संगठनों की ओर से 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की अपील की जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि भविष्य में बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग होने की घोषणा करता है, तो क्या वह एक स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल कर पाएगा?
किसी क्षेत्र द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा कर देना और उसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में किसी नए राज्य के अस्तित्व के लिए स्थायी आबादी, निश्चित भू-भाग, प्रभावी सरकार और अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता जैसे मानकों को महत्वपूर्ण माना जाता है। 1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन में राज्य के संदर्भ में इन चार मानकों का उल्लेख किया गया था।
हालांकि, व्यवहार में केवल इन मानकों को पूरा करना ही पर्याप्त नहीं होता। किसी नए राज्य की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर दूसरे देशों की राजनीतिक मान्यता, क्षेत्रीय परिस्थितियां और बड़ी शक्तियों के रणनीतिक हित भी गहरा प्रभाव डालते हैं।
बांग्लादेश से लेकर ताइवान तक अलग-अलग उदाहरण
दक्षिण एशिया में बांग्लादेश इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। 26 मार्च 1971 को स्वतंत्रता की घोषणा के बाद नौ महीने तक चले युद्ध के अंत में 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद बांग्लादेश को धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली और 1974 में वह संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना।
इसके विपरीत ताइवान दशकों से अलग स्थिति में है। वहां अपनी सरकार, सेना, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है, लेकिन चीन के ‘वन चाइना’ रुख और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समीकरणों के कारण ताइवान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है। यह उदाहरण बताता है कि किसी क्षेत्र का व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र रूप से संचालित होना और संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता प्राप्त करना अलग-अलग विषय हैं।
कोसोवो का मामला भी इसी जटिलता को दर्शाता है। बड़ी संख्या में देशों ने उसे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है, लेकिन सर्बिया सहित कुछ देश उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इसी कारण उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति पूरी तरह निर्विवाद नहीं है।
दूसरी तरफ दक्षिण सूडान ने 2011 में स्वतंत्रता हासिल करने के बाद अपेक्षाकृत तेजी से व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त की और उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया।
बलूचिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान और चीन
यदि भविष्य में बलूचिस्तान वास्तव में स्वतंत्र राज्य के रूप में उभरता है, तो उसके सामने सबसे कठिन चुनौती अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की होगी। संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए सुरक्षा परिषद की सिफारिश आवश्यक होती है और इसके बाद महासभा में दो-तिहाई बहुमत चाहिए।
यहां चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। बलूचिस्तान पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और रणनीतिक रूप से ग्वादर बंदरगाह तथा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के कारण बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। CPEC चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का प्रमुख हिस्सा है। इसलिए बलूचिस्तान में किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का सीधा असर चीन-पाकिस्तान रणनीतिक साझेदारी पर पड़ सकता है।
क्या भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है?
बलूचिस्तान का प्रश्न भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी संवेदनशील मुद्दा रहा है। हालांकि किसी संभावित स्वतंत्र बलूचिस्तान को लेकर भारत की भविष्य की नीति का अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगा। किसी भी औपचारिक समर्थन के पीछे नई दिल्ली को क्षेत्रीय सुरक्षा, पाकिस्तान के साथ संबंध, चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखना होगा।
सिर्फ आंदोलन नहीं, प्रभावी राज्य व्यवस्था भी जरूरी
बलूचिस्तान के स्वतंत्र देश बनने की संभावना का आकलन केवल वहां चल रहे अलगाववादी आंदोलन की ताकत से नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी होगा कि स्वतंत्रता की स्थिति में वहां कौन प्रभावी सरकार स्थापित करता है, पूरे क्षेत्र पर उसका कितना नियंत्रण होता है, संस्थाएं कितनी स्थिर होती हैं और उसे कितने देशों का समर्थन मिलता है।
यही कारण है कि बलूचिस्तान का भविष्य बांग्लादेश, ताइवान और कोसोवो से अलग भी हो सकता है और कुछ मायनों में उनके अनुभवों से मिलता-जुलता भी। अंततः किसी नए राष्ट्र की सफलता केवल स्वतंत्रता की घोषणा से नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी शासन, व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में स्वीकार्यता से तय होती है।
फिलहाल बलूचिस्तान के स्वतंत्र देश बनने की कोई निश्चित समयसीमा या ऐसी प्रक्रिया मौजूद नहीं है जिसे देखकर यह कहा जा सके कि वह निकट भविष्य में नया संप्रभु राष्ट्र बनने जा रहा है। लेकिन यदि वहां राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियां बड़े स्तर पर बदलती हैं, तो इसका प्रभाव पाकिस्तान के साथ-साथ चीन, भारत और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति पर पड़ सकता है।








