बाढ़ में डूबा कोचिंग तो नाव बनी पाठशाला… पानी के बीच किताबों से भविष्य गढ़ रहे बच्चे
कटिहार से रतन कुमार की रिपोर्ट

हालात चाहे कैसे भी हों बिहार और बिहारी हर चुनौती से लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। इसकी सीख बिहार के बच्चों को बचपन से ही मिलने लगती है। कटिहार में बाढ़ की इस त्रासदी के बीच इसी संकल्प को परिभाषित करती “नाव वाली पाठशाला” से आपको रूबरू कराते हैं जहां चारों तरफ पानी है लेकिन बच्चों की किताबें अब भी खुली हैं। बाढ़ में स्कूल डूब गया, घर भी पानी में समा गए… कोचिंग जलमग्न है… रास्ते भी गायब हो गए लेकिन बच्चों की पढ़ाई नहीं डूबी। कटिहार के अमदाबाद में बाढ़ की त्रासदी के बीच चल रही इस “नाव वाली पाठशाला” में बच्चे पानी के बीच बैठकर भविष्य का सबक पढ़ रहे हैं। अमदाबाद प्रखंड के रघुनाथपुर में बाढ़ ने पूरा इलाका अपनी चपेट में ले लिया है। सरकारी विद्यालय डूब चुके हैं, कोचिंग संस्थाएं बंद हैं और कई बच्चों के घर भी पानी में डूब गए हैं। सड़क किनारे पॉलिथीन के नीचे लोग किसी तरह जिंदगी गुजार रहे हैं।

ऐसे हालात में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप न हो इसके लिए शिक्षक मोहम्मद साहब ने नाव को ही पाठशाला बना दिया। रोज नाव चलती है। नाव में बच्चे होते हैं उनके हाथों में किताब कॉपियां होती हैं और सामने चारों तरफ फैला बाढ़ का पानी। शिक्षक मोहम्मद साहब डूबे इलाकों से कुछ छात्र-छात्राओं को नाव के जरिए कम पानी वाले सुरक्षित स्थान तक लाते हैं और वहीं नाव पर पढ़ाई शुरू होती है। न घंटी बजती है न चारदीवारी है और न ही कोई बड़ा क्लासरूम… फिर भी नाव पर बच्चों की पढ़ाई पूरी गंभीरता से चल रही है। बाढ़ के पानी के बीच बैठा सत्यम हो या अन्नु, रोहन हो या रेहान सामने मुश्किलें जरूर हैं लेकिन किताबें बंद नहीं हुई हैं। सोचिए जिन बच्चों के घरों में इस वक्त चूल्हा जलना मुश्किल है उनके हाथों में किताबें हैं। जिनके स्कूल तक पानी पहुंच चुका है उनके लिए शिक्षक ने नाव को पाठशाला बना दिया है। कटिहार की बाढ़ ने बहुत कुछ छीन लिया है। लेकिन इस “नाव वाली पाठशाला” ने एक उम्मीद बचा रखी है की बच्चों की पढ़ाई और उनके सपने पूरे होंगे। पानी कितना भी गहरा हो… नाव कितनी भी छोटी हो… अगर पढ़ने की जिद और पढ़ाने का जुनून हो तो पाठशाला का रास्ता निकल ही आता है।








