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फूलपुर में हाशिम ज़फ़र नियाउजी के एज़ाज़ में तरही मुशायरा आयोजित

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फूलपुर में हाशिम ज़फ़र नियाउजी के एज़ाज़ में तरही मुशायरा आयोजित

फूलपुर, आजमगढ़। 3 अक्टूबर की रात फूलपुर तहसील मोड़ स्थित ZFM कार्यालय पर हाशिम ज़फ़र नियाउजी के एज़ाज़ में दबिस्तान-ए-अयाज़ की ओर से तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आग़ाज़ तिलावत-ए-कलाम पाक से मोहम्मद ख़ाशे ने किया कार्यक्रम की पहली नशिस्त में शाद आज़मी नदवी की नज़्मों की दो किताबों ‘नई सुबह’ और ‘इरादे’ का रस्म-ए-इजरा किया गया। कार्यक्रम की सदारत डॉक्टर शफ़ीक आज़मी ने की, जबकि निज़ामत नसीम साज़ ने की। मेहमान-ए-ख़ुसूसी के तौर पर साक़िब लोहियावी मुबारकपुरी ने शिरकत की।

मुशायरे में शायरों ने तरही मिसरे की रौशनी में अपना कलाम पेश किया। 

जानता है हर कोई है किस क़दर कार-ए-सवाब,
फिर भी हमसाये का हक़ कोई अदा करता नहीं।

डॉक्टर शफ़ीक आज़मी 

 

हर दीये की सम्त ललचा कर न देखा कीजिए,
रोशनी का दान तो हर इक दीया करता नहीं।

सुहैल अख़्तर सिकरौरी

ज़ेहन-ओ-दिल जिसका भी मिस्ल-ए-आईना शफ़्फ़ाफ़ हो,
साज़िशों के ताने-बाने वह बुना करता नहीं।

मुख़्तार आलम आज़मी 

कोई मेरे पास से मुझको उठा कर ले गया,
आजकल मैं अपने अंदर भी रहा करता नहीं।

मैकश अंजुमी  

तुम मुसलमां हो तुम्हें तो शुक्र करना चाहिए,
कोई मोमिन अपनी क़िस्मत का गिला करता नहीं।

डॉक्टर रिज़वान मुहज़्ज़बी-

 

इश्क़ की फ़ितरत में आशुफ़्ता-सरी है दोस्तों,
इश्क़ का रिश्ता ख़िरद से तो हुआ करता नहीं।

हाशिम ज़फ़र नियाउजी 

चाँद से तश्बीह दूँ मैं किस तरह दिलबर तेरी,
चाँद भी बेशक तेरे जैसा हुआ करता नहीं।

सागर जौनपुरी 

वो तो पा सकता नहीं हरगिज़ मुसीबत से नजात,
जो भी जान-ओ-माल का सदक़ा अदा करता नहीं।

नसीम साज़ 

 

वो मेरी दीवानगी की हद चला है नापने,
ख़ुद को जो अपनी हदों से आश्ना करता नहीं।

डॉक्टर अनवर

वक़्त के फ़िरऔन को शायद नहीं मालूम ये,
सर-निगूँ बातिल के आगे हक़ हुआ करता नहीं।

असलम अली इस्लाही 

ज़ोर तूफ़ाँ का हो चाहे आँधियों का हो सितम,
मैं चराग़-ए-राह-ए-उल्फ़त हूँ बुझा करता नहीं।

रफ़ीक फूलपुरी

जोड़ दूँ मैं कैसे अपना नाम तेरे नाम से,
टाट का पैवंद मख़मल पर लगा करता नहीं।

याक़ूब आज़म 

मुद्दतों से कितने ग़म दिल में लिए बैठा हूँ मैं,
बावजूद इसके मैं दिल को कर्बला करता नहीं।

साक़िब जमाल

 

चलने वालों को ही जाना पड़ता है मंज़िल तक,
मंज़िलें ख़ुद चल के आएँ ये हुआ करता नहीं।

समर नाज़िरी

ज़िंदगी देने लगी है दर्द की लज़्ज़त मुझे,
इसलिए मैं दर्द की अपने दवा करता नहीं।

अबू शहमा शीराज़ी

बेच बैठा है जो ईमान चंद सिक्कों के लिए,
आह मज़लूमों के दिल की वो सुना करता नहीं।

अहमद परवाज़ 

रश्क करती है शुजाअत हर घड़ी उस शख़्स पर,
नाज़ जिसको अपनी ताक़त पर हुआ करता नहीं।

अंजर आज़मी 

सब नशेड़ी मर गए क्या आज तेरे शहर में,
क्यों किसी नुक्कड़ पे अब कोई नशा करता नहीं।

निहाल मनचला 

इसके अलावा तस्कीन आज़मी, डॉक्टर फ़य्याज़ अलीग, अबू साद आज़मी, शाद आज़मी नदवी, फ़साद आज़मी वगैरह ने भी अपना कलाम पेश किया कार्यक्रम के दौरान शायरों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इश्क़, इंसानियत, सामाजिक सरोकार, ज़िंदगी और विभिन्न मानवीय भावनाओं को शायरी के अंदाज़ में पेश किया। अदबी महफ़िल में मौजूद श्रोताओं ने शायरों के कलाम को सुना और सराहा। इस दौरान कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने साहित्यिक और अदबी गतिविधियों को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया।

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