अदालत ने कहा—कब्जा लेने से मुआवजे का अधिकार खत्म नहीं होता, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा जरूरी
नई दिल्ली : घर खरीदने वाले लोगों के अधिकारों को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी खरीदार को फ्लैट का कब्जा तय समय से काफी देर से मिलता है, तो वह कब्जा लेने के बाद भी देरी के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल फ्लैट का कब्जा स्वीकार कर लेने से यह नहीं माना जा सकता कि खरीदार ने देरी से हुए नुकसान का दावा करने का अधिकार छोड़ दिया है। यदि परियोजना में अनावश्यक देरी हुई है और खरीदार को आर्थिक या मानसिक नुकसान उठाना पड़ा है, तो वह उसके लिए मुआवजे का हकदार हो सकता है।
यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने सुनाया। अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के वर्ष 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि फ्लैट का कब्जा लेने के बाद शिकायतकर्ता उपभोक्ता नहीं रह जाता और वह मुआवजे की मांग नहीं कर सकता।
क्या था मामला?
यह मामला दिल्ली की एक सहकारी ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2003 में फ्लैट के लिए सदस्यता ली थी, लेकिन उसे काफी देरी से फ्लैट का कब्जा मिला। इसके बाद उसने देरी को सेवा में कमी बताते हुए उपभोक्ता फोरम में मुआवजे की मांग की थी।
हालांकि, जिला फोरम और राज्य आयोग ने मामले को मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के लिए भेज दिया, जबकि एनसीडीआरसी ने तकनीकी आधार पर शिकायत खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कब्जा मिलने में हुई देरी का मूल्यांकन उस अवधि के आधार पर किया जाना चाहिए, जब तक खरीदार को फ्लैट नहीं मिला था। केवल कब्जे की रसीद पर हस्ताक्षर कर देने से यह नहीं माना जा सकता कि खरीदार ने मुआवजे का अधिकार छोड़ दिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि यह जांच जरूरी है कि देरी के लिए जिम्मेदार कौन था और क्या खरीदार ने वास्तव में बिना किसी शर्त के कब्जा स्वीकार किया था।
उपभोक्ता अधिकारों पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून उपभोक्ताओं को सस्ता, सरल और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसलिए किसी समझौते में मध्यस्थता की शर्त होने मात्र से उपभोक्ता फोरम का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।
मामला फिर से सुनवाई के लिए भेजा गया
अदालत ने एनसीडीआरसी, राज्य आयोग और जिला फोरम के पुराने आदेशों को रद्द करते हुए उपभोक्ता की शिकायत दोबारा बहाल कर दी है। साथ ही द्वारका स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों को सुनकर और सभी साक्ष्यों पर विचार करते हुए मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2005 से लंबित इस मामले का निस्तारण यथासंभव एक वर्ष के भीतर किया जाए।








