मतदाता सूची से नाम हटने से नागरिकता खत्म नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं होने या हटाए जाने मात्र से उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं मानी जा सकती। अदालत ने कहा कि नागरिकता का निर्धारण करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है।
जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ पश्चिम बंगाल से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने बिहार से जुड़े अपने पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम नागरिकता पर संदेह के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह मामला नागरिकता कानून के तहत निर्णय के लिए केंद्र सरकार को भेजे। जब तक इस प्रक्रिया के तहत अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक संबंधित व्यक्ति की नागरिकता का दर्जा बना रहता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने बताया कि नागरिकता संबंधी अपीलीय ट्रिब्यूनलों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। उनका कहना था कि लाखों अपीलों का अभी तक निपटारा नहीं हो पाया है, जबकि जिन मामलों का फैसला हुआ है, उनमें बड़ी संख्या में अपीलकर्ताओं को राहत मिली है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद कुछ लोगों को जन वितरण प्रणाली (पीडीएस), अन्नपूर्णा योजना जैसी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है। साथ ही, जाति प्रमाण पत्र जारी करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि चुनाव आयोग केवल मतदाता सूची के प्रबंधन का संवैधानिक दायित्व निभाता है, जबकि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार संबंधित कानून के तहत केंद्र सरकार के पास है। इसलिए केवल मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकार स्वतः समाप्त नहीं माने जा सकते।








