
(आलेख: विक्रम सिंह) फोटो
देश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का सबसे बड़ा सहारा रहा मनरेगा अब अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। इसकी जगह लाई जा रही नई व्यवस्था ‘वीबी-ग्राम (जी)’ को लेकर न तो स्पष्ट नियम सामने आए हैं और न ही जमीनी स्तर पर काम शुरू हो पाया है। इसका सीधा असर लाखों ग्रामीण मजदूरों की आजीविका पर पड़ रहा है।
मनरेगा एक अधिकार-आधारित कानून था, जो हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी देता था। लेकिन नई व्यवस्था में यह गारंटी खत्म होती दिख रही है। अब योजना बजट-आधारित हो गई है, जिससे काम की उपलब्धता मांग के बजाय आवंटन पर निर्भर हो गई है। इससे राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है, क्योंकि उन्हें अब 40% खर्च खुद उठाना होगा।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई योजना के नियम अभी तक तय नहीं किए गए हैं। अप्रैल 2026 से लागू होने के बावजूद मजदूरों को न मनरेगा में काम मिल रहा है और न ही वीबी-ग्राम (जी) के तहत। कई जगहों पर अधिकारियों ने साफ कह दिया है कि फिलहाल काम उपलब्ध नहीं है, जिससे ग्रामीण इलाकों में असमंजस और असुरक्षा बढ़ गई है।
आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। अप्रैल 2026 के मध्य तक मनरेगा के तहत काम के अवसरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। पिछले साल की तुलना में कार्य दिवसों की संख्या बेहद कम रह गई है। वहीं, मजदूरी भुगतान में भी देरी हो रही है और हजारों करोड़ रुपये का बकाया लंबित है।
कई राज्यों में अधूरे पड़े काम और रुकी परियोजनाएं स्थिति को और जटिल बना रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लाखों काम अधूरे हैं, जबकि सामग्री का भुगतान भी अटका हुआ है। इससे मजदूरों के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा की कमजोर होती व्यवस्था का असर पहले से दिखने लगा था। रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या घटी है, औसत कार्य दिवस कम हुए हैं और 100 दिन का रोजगार पूरा करने वाले परिवारों में भी तेज गिरावट आई है। महिलाओं और दलित समुदाय की भागीदारी में भी कमी दर्ज की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी बाधाएं, जैसे ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली, भी काम मिलने में रुकावट बन रही हैं। इससे उन मजदूरों को अधिक परेशानी हो रही है, जिनके पास डिजिटल संसाधनों की कमी है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा नुकसान मजदूरों को उठाना पड़ रहा है। उनके पास काम मांगने का अधिकार भी अब स्पष्ट नहीं रह गया है। ऐसे में खेत मजदूर संगठनों ने नई योजना को वापस लेने और मजबूत मनरेगा बहाल करने की मांग तेज कर दी है। 15 मई को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान भी किया गया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले ही दबाव में है। ऐसे समय में रोजगार की गारंटी कमजोर होना आने वाले दिनों में बड़े सामाजिक और आर्थिक संकट का संकेत दे रहा है।








