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सऊदी अरब-अमेरिका के बीच ऐतिहासिक परमाणु समझौता, मिडिल ईस्ट की राजनीति में नए समीकरणों के संकेत

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सऊदी अरब-अमेरिका के बीच ऐतिहासिक परमाणु समझौता, मिडिल ईस्ट की राजनीति में नए समीकरणों के संकेत

रियाद/वॉशिंगटन। सऊदी अरब और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु सहयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के तहत अमेरिका सऊदी अरब को बिजली उत्पादन के लिए असैन्य परमाणु तकनीक उपलब्ध कराएगा। ऐसे समय में हुए इस समझौते को बेहद अहम माना जा रहा है, जब मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) क्षेत्र युद्ध, सुरक्षा चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रहा है।

विशेषज्ञ इस समझौते को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मान रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह पिछले कई वर्षों से अमेरिका के साथ इस तरह के समझौते के प्रयास कर रहे थे।

क्यों विवादों में है समझौता?

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के कुछ अधिकारियों, परमाणु विशेषज्ञों और इजराइल से जुड़े सुरक्षा विश्लेषकों ने इस समझौते पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि यदि भविष्य में सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (यूरेनियम एनरिचमेंट) की क्षमता मिलती है, तो इससे परमाणु हथियार विकसित करने की आशंका बढ़ सकती है और मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी अपनी सुरक्षा के लिए वैसी ही क्षमता विकसित करने पर विचार करेगा।

अमेरिका की शर्तों से अलग व्यवस्था

अमेरिका अब तक 26 देशों के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते कर चुका है। भारत के साथ भी वर्ष 2008 में ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता हुआ था। आमतौर पर अमेरिका ऐसे समझौतों में संबंधित देश से स्वयं यूरेनियम संवर्धन नहीं करने की शर्त रखता है। हालांकि, इस नए समझौते को लेकर चर्चा है कि इसमें उस विषय पर अलग व्यवस्था की गई है, जिससे बहस तेज हो गई है।

सऊदी अरब में यूरेनियम के भंडार मौजूद हैं और उसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपनी बिजली उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से प्राप्त करना है, ताकि तेल पर निर्भरता कम की जा सके।

इजराइल से रिश्तों को समझौते से किया अलग

इस समझौते की रूपरेखा पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में तैयार होनी शुरू हुई थी। उस समय अमेरिका चाहता था कि परमाणु सहयोग के बदले सऊदी अरब इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित करे।

लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा युद्ध शुरू होने के बाद सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन से पहले वह इजराइल को मान्यता नहीं देगा। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने परमाणु समझौते को इजराइल के साथ संबंधों की शर्त से अलग कर आगे बढ़ाया।

सऊदी और अमेरिका दोनों को संभावित लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण में लगभग एक दशक या उससे अधिक समय लग सकता है। ऐसे में सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिकी तकनीक और सहयोग पर निर्भर रहेगा। इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध और मजबूत होने की संभावना है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की विशेषज्ञ कैरेन यंग के अनुसार, यह समझौता केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति और सऊदी अरब की रणनीतिक भूमिका को भी मजबूत करेगा।

अमेरिका को भी इस समझौते से दो प्रमुख लाभ मिलने की संभावना है। पहला, अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण के बड़े ठेके मिल सकते हैं। दूसरा, अमेरिका को सऊदी के परमाणु कार्यक्रम पर करीबी निगरानी रखने का अवसर मिलेगा, जिससे परमाणु प्रसार संबंधी चिंताओं पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

चीन और रूस भी थे विकल्प

विश्लेषकों के अनुसार, यदि अमेरिका के साथ समझौता नहीं हो पाता तो सऊदी अरब चीन, रूस, फ्रांस या दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भी परमाणु सहयोग का रास्ता अपना सकता था। चीन की चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन (CNNC) और रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम पहले ही सऊदी अरब के साथ परमाणु परियोजनाओं में रुचि जता चुकी हैं।

अमेरिकी संसद में हो सकता है विरोध

इस समझौते को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में भी राजनीतिक मतभेद सामने आ रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सांसदों ने आशंका जताई है कि इससे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के प्रयास भी कमजोर पड़ सकते हैं।

हालांकि, समझौते को रोकने के लिए कांग्रेस को संयुक्त प्रस्ताव (जॉइंट रिजोल्यूशन) पारित करना होगा, जिसे राजनीतिक रूप से आसान नहीं माना जा रहा। आने वाले दिनों में इस समझौते पर अमेरिकी संसद में व्यापक बहस होने की संभावना है।

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