सवालों के घेरे में सहारनपुर की कार्रवाई, आवाज उठाने वाली हुदा जरीवाला को जेल, मस्जिद पर बुलडोजर_क्या यही आजाद भारत है?
सहारनपुर। सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित करीब 115 वर्ष पुरानी मस्जिद को कथित अवैध बताकर ध्वस्त किए जाने की कार्रवाई और इस मुद्दे पर आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता एवं मीडिया से जुड़ी हुदा जरीवाला की गिरफ्तारी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व से प्रस्तुत किया जाता है, जहां हर नागरिक को अपनी बात रखने और सवाल पूछने की आजादी का अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि जब कोई पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता किसी एक विशेष समुदाय की आवाज और उसके अधिकारों के पक्ष में सवाल उठाता है, तो क्या उसे ट्रोलिंग, मुकदमे और जेल का सामना करना पड़ेगा?
हुदा जरीवाला ने मस्जिद को हटाए जाने की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा प्रशासन की कार्यशैली पर टिप्पणी की। इसके बाद उन पर कार्रवाई हुई और उन्हें जेल भेज दिया गया। क्या लोकतंत्र में सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध हो गया है?
सबसे बड़ा सवाल मस्जिद को लेकर भी है। यदि यह इमारत वास्तव में अवैध थी, तो क्या उसे हटाने से पहले न्यायिक प्रक्रिया और कानून के सभी निर्धारित मानकों का पालन किया गया? क्या इस कार्रवाई के संबंध में कोई न्यायालयी आदेश था? यदि प्रशासन के पास वैधानिक अधिकार और आदेश थे, तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट क्यों नहीं किया जाना चाहिए, ताकि किसी तरह का भ्रम न रहे?
और यदि यह मस्जिद वास्तव में ऐतिहासिक और करीब 115 वर्ष पुरानी थी, तो क्या उसके इतिहास, धार्मिक भावनाओं और उससे जुड़े लोगों के पक्ष को ध्यान में रखते हुए कोई वैकल्पिक कानूनी रास्ता नहीं निकाला जा सकता था?
क्या बुलडोजर ही हर विवाद का समाधान है?
आज देश में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की बात होनी चाहिए। लेकिन यदि विवादों का समाधान बुलडोजर की कार्रवाई और उसके बाद मुकदमों से होने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?
एक और गंभीर सवाल यह भी है कि क्या देश में ऐसी विचारधारा मजबूत हो रही है, जिसमें मस्जिदों, ईदगाहों और कब्रिस्तानों को लेकर लगातार विवाद खड़े किए जा रहे हैं? यदि ऐसा है, तो क्या यह भारत के उस विचार से मेल खाता है, जिसमें सभी धर्मों और समुदायों को समान सम्मान और अधिकार देने की बात कही गई है?
भारत में मुसलमान इस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। वे भी इसी मिट्टी के नागरिक हैं, उनके भी धार्मिक स्थल, भावनाएं और अधिकार हैं। फिर किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को बार-बार निशाना बनाए जाने का आरोप क्यों सामने आता है?
मंदिर-मस्जिद से आगे कब बढ़ेगा भारत?
आज जरूरत इस बात की है कि देश की राजनीति और समाज मंदिर-मस्जिद के विवादों से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और विकास की बात करे।
अगर भारत को वास्तव में विकसित भारत बनाना है, तो क्या हमें धार्मिक विवादों को बढ़ाने के बजाय आपसी भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने पर ध्यान नहीं देना चाहिए?
सवाल हुदा जरीवाला के समर्थन या विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में सत्ता से सवाल पूछने की आजादी सभी के लिए समान है? क्या किसी समुदाय के अधिकारों की बात करने वाले की आवाज को दबाने के बजाय उसका जवाब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं दिया जा सकता?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या यही वह आजाद भारत है, जिसकी स्वतंत्रता और लोकतंत्र की हम बड़ी-बड़ी कसमें खाते हैं?








