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फूलपुर में सजी गैर तरही मुशायरे की यादगार महफिल, देर रात तक गूंजते रहे शायरों के कलाम

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फूलपुर में सजी गैर तरही मुशायरे की यादगार महफिल, देर रात तक गूंजते रहे शायरों के कलाम

फूलपुर, आज़मगढ़।फूलपुर तहसील निकट स्थित ZFM कार्यालय पर शनिवार की रात 12 सितंबर 2026 को गैर तरही मुशायरे का शानदार आयोजन किया गया। अदब और शायरी से सजी इस महफिल में स्थानीय एवं आसपास के क्षेत्रों से आए शायरों ने अपने कलाम पेश कर देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा।

कार्यक्रम का आगाज़ तिलावत-ए-कलामुल्लाह से साक़िब जमाल ने किया मुशायरे की सदारत मैकश अंजुमी ने की, जबकि निज़ामत नसीम साज़ ने अपने खास अंदाज़ में की।

ZFM Foundation के संस्थापक ज़ीशान अहमद ख़ान सामाजिक और अदबी गतिविधियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी ज़िन्दगी में ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का जज़्बा किसी से छिपा नहीं है फाउंडेशन का उद्देश्य अदब को फ़रोग़ देने के साथ समाज के दबे-कुचले तबकों तक तालीम और जरूरतमंद बीमारों तक दवा पहुंचाना तथा मीडिया के माध्यम से आम लोगों की आवाज़ को सामने लाना है।

मुख्य अतिथि मास्टर शमीम अहमद इस्लाही ने कहा कि उर्दू अदब की खिदमत के लिए आयोजित होने वाले छोटे-छोटे मुशायरों की अपनी अहमियत है। उन्होंने कहा कि उर्दू को आगे बढ़ाने में शायरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई प्रतिभाओं को अपनी कला और हुनर दिखाने का अवसर मिलता है।

शायरों के कलाम

क्या पता उस शख़्स ने क्या-क्या कहा अल्लाह से

आसमाँ हिलने लगा जैसे दुआ करने के बाद

मैकश अंजुमी

मक़सद अज़ीम हो तो बजा है हर एक बात

बेवजह जो आसमाँ न सर पर उठाइए

डॉक्टर शफ़ीक़ आज़मी

जो ईंट फेंके उसे दो जवाब पत्थर से

यूँ ही किसी पे सितम इख़्तियार मत करना

सुहैल अख़्तर सिकरौरी

हर शख़्स के चेहरे पे अदाकारी बहुत है

अपनों की शनासाई में दुश्वारी बहुत है

मुख़्तार आलम आज़मी

किसी के पाँव में गुल चुभ रहे हैं

कोई काँटों पे चलता जा रहा है

डॉक्टर रिज़वान महज़बी

एक-एक हर्फ़ लहू माँग रहा है उसका

इतना आसान भी नहीं सीने में पिन्हाँ होना

तस्कीन आज़मी

अज्र सदक़े का मेरे यार तुझे मिल जाता

तूने जो राह में पत्थर था हटाया होता

नसीम साज़

मीरास बुज़ुर्गों की बचाने में दोस्तो

अक्सर शरीफ़ज़ादों के जूते भी फट गए

अनवर इस्लाही

ज़ुल्फ़ परेशां आँखों में आँसू और ये आँधी जैसी चाल

ढूंढ रही हो जैसे कोई दीवानी, दीवाने को

रफ़ीक़ फूलपुरी

ये तो मग़रिब की तहज़ीब है

क्यों उठा लाए बाज़ से

आज़म भादवी

जब लगा ये हमें बेसहारे हैं हम

दी सदा फिर किसी ने तुम्हारे हैं

साक़िब जमाल

घटाओं से कहो इतना न बरसें

घरों की सबके पुख़्ता छत नहीं है

असलम इस्लाही

सजदे तो लोग करते हैं अपनी ग़रज़ से अब

सर झुक गया है पर वो इबादत नहीं रही

अबू साद आज़मी

सभी को अपनी जानिब खींचता है

तुम्हारा शहर-ए-शहर रंग-ओ-बू है

अबू शहमा शीराज़ी

एक वो थे जो तरक़्क़ी के फ़लक पर छा गए

एक हमसे ज़िंदगी भर में कशी करते रहे

अहमद परवाज़

जो हफ़्ता जाते-जाते दाँतों को बर्छी बना डाले

मेरी बीवी को बेहद ऐसा मंजन अच्छा लगता है

निहाल मचल़ा

दर्द-ए-दिल अपना हम बताएँ क्या

क़िस्सा-ए-हाल-ए-दिल सुनाएँ क्या

अनज़र आज़मी

पूरी महफिल के दौरान शेरो-शायरी, अदब और साहित्यिक चर्चा का सिलसिला देर रात तक चलता रहा कार्यक्रम में नगर के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे, जिनमें डॉ. मोहम्मद राशिद, हिसामुद्दीन, फारूक, एहसान, हैदर अली, आफ़ताब आलम, सभासद इफ्तिखार अहमद, आकिब अंसारी, मुनाफ, अरमान, अब्दुल्ला, हमज़ा सहित अन्य लोग शामिल रहे।

कार्यक्रम के समापन पर ZFM के संगठन प्रभारी रफ़ीक़ फूलपुरी ने मुशायरे में शिरकत करने वाले सभी शायरों और अतिथियों का स्वागत एवं आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि अदब और साहित्य से जुड़े ऐसे आयोजन समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का काम करते हैं। उन्होंने सभी शायरों और उपस्थित लोगों का कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया।

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